भारतीय सिनेमा हमेशा से समाज का आईना रहा है। फिल्मों ने कई बार ऐसे मुद्दों को उठाया है जिन पर चर्चा करना ज़रूरी होता है, लेकिन कुछ फिल्में शुरुआत से ही विवादों में घिर जाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है ‘द बंगाल फाइल्स’, जिसने रिलीज से पहले ही सिनेमा जगत और राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है। पश्चिम बंगाल में यह फिल्म रिलीज नहीं हो पाई, जिससे दर्शकों के बीच जिज्ञासा और गुस्सा दोनों देखने को मिल रहा है।
इस विवाद का सबसे बड़ा पहलू यह है कि फिल्म की प्रोड्यूसर और ऐक्ट्रेस पल्लवी जोशी ने सीधे राष्ट्रपति को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है। वहीं, दूसरी तरफ थिएटर मालिकों और सिनेमा हॉल संचालकों का कहना है कि हालात और माहौल को देखते हुए उनके पास फिल्म को न दिखाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
अब सवाल उठता है – आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है जिसने इसे रिलीज़ होने से रोक दिया? क्या यह मामला केवल राजनीतिक दबाव का है या फिर वास्तव में कोई संवेदनशील मुद्दा छुपा हुआ है? आइए जानते हैं इस पूरे विवाद को विस्तार से।
1. द बंगाल फाइल्स विवाद
फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ का नाम सुनते ही दर्शकों के मन में उत्सुकता पैदा हो गई थी। ट्रेलर लॉन्च के बाद ही सोशल मीडिया पर चर्चा छिड़ गई और लोगों ने इसे लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएँ दीं। फिल्म पर आरोप लगाया गया कि यह इतिहास को एक विशेष दृष्टिकोण से दिखाती है और समाज में विभाजनकारी माहौल बना सकती है।
कुछ राजनीतिक दलों और संगठनों ने खुलकर इस फिल्म का विरोध किया और कहा कि इससे बंगाल की शांति भंग हो सकती है। नतीजतन, राज्य के कई हिस्सों में थिएटर मालिकों ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए फिल्म को रिलीज न करने का फैसला किया। यही वजह है कि यह फिल्म बंगाल में दर्शकों तक नहीं पहुँच पाई और विवाद गहराता चला गया।
2. पल्लवी जोशी लेटर
फिल्म की निर्माता और प्रमुख अभिनेत्री पल्लवी जोशी ने इस विवाद पर गंभीर कदम उठाया। उन्होंने राष्ट्रपति को एक चिट्ठी लिखकर कहा कि यह केवल फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि सच को सामने लाने की कोशिश है। उनका तर्क है कि लोकतंत्र में किसी भी कलाकार को अपनी बात कहने का अधिकार है, और सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिलने के बाद फिल्म पर रोक लगाना अभिव्यक्ति की आज़ादी के खिलाफ है।
पल्लवी जोशी ने अपने पत्र में साफ लिखा कि अगर राजनीतिक दबाव के कारण फिल्मों को रोका जाएगा, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए गलत उदाहरण होगा। उन्होंने राष्ट्रपति से अपील की है कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और सुनिश्चित करें कि फिल्म हर जगह दर्शकों तक पहुँचे।
3. बंगाल में फिल्म बैन
‘द बंगाल फाइल्स’ को बंगाल में रिलीज़ न करने का फैसला किसी आधिकारिक सरकारी आदेश की वजह से नहीं, बल्कि अप्रत्यक्ष दबाव और माहौल को देखते हुए लिया गया। थिएटर मालिकों को डर था कि अगर फिल्म दिखाई गई तो विरोध-प्रदर्शन, तोड़फोड़ या कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति बन सकती है।
यहां सवाल उठता है – जब फिल्म को पहले ही सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिल चुकी है, तो फिर बैन जैसी स्थिति क्यों बनी? क्या यह किसी खास विचारधारा को बचाने की कोशिश है या फिर जनता को किसी सच से दूर रखने की रणनीति? इस बैन ने दर्शकों के मन में और भी जिज्ञासा जगा दी है कि फिल्म में ऐसा क्या दिखाया गया है जिसे देखने से रोका जा रहा है।
4. राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग
जब मामला लगातार गरमाने लगा तो पल्लवी जोशी ने राष्ट्रपति से सीधा हस्तक्षेप करने की मांग की। उनका कहना है कि लोकतांत्रिक भारत में कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर इस तरह का हमला न केवल कलाकारों बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों पर भी प्रहार है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि ‘द बंगाल फाइल्स’ जैसी फिल्मों को केवल राजनीतिक कारणों से रोका जाएगा, तो आने वाले समय में कोई भी फिल्मकार सच्चाई पर आधारित कहानी कहने से डर जाएगा। राष्ट्रपति के हस्तक्षेप की मांग ने इस विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।
5. थियेटर संचालकों की प्रतिक्रिया
“थियेटर मालिकों और सिनेमा हॉल संचालकों का मानना है कि परिस्थितियों ने उन्हें मजबूर कर दिया। उनका कहना है कि वे फिल्म प्रदर्शित करना चाहते थे, लेकिन हालात को देखते हुए सुरक्षा को खतरे में डालना संभव नहीं था।” उनका कहना है कि अगर विरोध-प्रदर्शन भड़कते हैं तो सबसे पहले नुकसान थिएटर मालिकों और दर्शकों का होगा।
कुछ थिएटर संचालकों ने यहां तक कहा कि उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से चेतावनी दी गई थी कि अगर फिल्म दिखाई गई तो परिणाम भुगतने होंगे। ऐसे में उन्होंने नुकसान और हिंसा से बचने के लिए फिल्म को स्क्रीन पर न उतारने का फैसला लिया।
द बंगाल फाइल्स’ निष्कर्ष
‘द बंगाल फाइल्स’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि आज़ादी, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल खड़े करती है। जहां एक ओर पल्लवी जोशी जैसी कलाकार फिल्म के ज़रिए सच दिखाने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी ओर राजनीतिक और सामाजिक दबाव इसे रोक देता है।
यह विवाद हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सच दिखाने की कोशिशें हमेशा विवादों और बैन की भेंट चढ़ेंगी?
आपके विचार
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