बॉलीवुड में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिनके काम पर हमेशा चर्चा होती रहती है। निर्देशक अनुराग कश्यप उन्हीं में से एक हैं। वे अपने हटके विषयों, डार्क कहानी कहने की शैली और एक्सपेरिमेंटल फिल्ममेकिंग के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्में दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती हैं और अक्सर सिनेमा को नई दिशा भी देती हैं। लेकिन, हाल ही में दिग्गज अभिनेता, लेखक और गीतकार पीयूष मिश्रा ने अनुराग कश्यप की फिल्मों को लेकर बड़ा बयान दिया है।
एक इंटरव्यू में पीयूष मिश्रा ने साफ कहा कि अनुराग कश्यप की फिल्मों का पहला हिस्सा हमेशा दमदार होता है, लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी अक्सर बिखर जाती है। उन्होंने विशेष रूप से गुलाल और देव डी जैसी फिल्मों का उदाहरण दिया, जिनके दूसरे हिस्से को उन्होंने “कमजोर” और “बर्बाद” करार दिया।
इस बयान के बाद फिल्म इंडस्ट्री और सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। आखिर अनुराग कश्यप की फिल्मों में ऐसा क्या होता है कि इंटरवल के बाद कहानी कमजोर पड़ जाती है? क्या पीयूष मिश्रा की यह आलोचना सही है या सिर्फ व्यक्तिगत राय?
आइए जानते हैं विस्तार से—

पीयूष मिश्रा ने गुलाल और देव डी जैसी फिल्मों के दूसरे भाग को बर्बाद करने के लिए अनुराग कश्यप की आलोचना की है और उनकी कहानी कहने के तरीके पर निराशा व्यक्त की है। “Image Courtesy:Instagram/@officialpiyushmishra/@anuragkashyap10
अनुराग कश्यप फिल्में: शुरुआत दमदार, लेकिन आखिर में क्यों होती हैं कमजोर?
अनुराग कश्यप बॉलीवुड के उन निर्देशकों में से हैं जिन्होंने कमर्शियल और पैरेलल सिनेमा के बीच की दूरी को कम किया। उनकी फिल्में समाज, राजनीति और रिश्तों की सच्चाई को बड़े पर्दे पर कच्चे रूप में पेश करती हैं। ब्लैक फ्राइडे, गैंग्स ऑफ वासेपुर, गुलाल, देव डी और रामन राघव 2.0 जैसी फिल्में इस बात का सबूत हैं।
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लेकिन पीयूष मिश्रा का मानना है कि अनुराग कश्यप की फिल्मों में कहानी की पकड़ शुरुआत में मजबूत होती है, दर्शक गहराई तक जुड़ते हैं, लेकिन इंटरवल के बाद प्लॉट अक्सर ढीला पड़ जाता है। इससे दर्शक का इमोशनल कनेक्शन टूट जाता है।
कई समीक्षकों ने भी यही कहा है कि अनुराग की फिल्में विचारों और किरदारों में तो बेहद दमदार होती हैं, लेकिन उनका स्क्रीनप्ले और क्लाइमेक्स कमजोर पड़ जाता है। यही कारण है कि उनकी फिल्में हमेशा मास अपील नहीं बना पातीं।
पीयूष मिश्रा इंटरव्यू: निर्देशक पर सीधी चोट या रचनात्मक बहस?
अपने हालिया इंटरव्यू में पीयूष मिश्रा ने अनुराग कश्यप के काम की तारीफ भी की, लेकिन साथ ही उनकी सबसे बड़ी कमजोरी पर उंगली रखी। उन्होंने कहा, “अनुराग का पहला हाफ तो लाजवाब होता है, लेकिन दूसरा हाफ बिगड़ जाता है। यह उनकी फिल्मों की दिक्कत है।”
ये बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि पीयूष मिश्रा खुद अनुराग कश्यप की फिल्मों का हिस्सा रह चुके हैं। गुलाल में उनका काम दर्शकों को आज भी याद है। ऐसे में उनकी राय सिर्फ आलोचना नहीं, बल्कि अनुभव से निकली सच्चाई मानी जा रही है।
सोशल मीडिया पर इस बयान के बाद दो तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। कुछ लोग मिश्रा से सहमत नजर आए और बोले कि “हां, अनुराग की फिल्में वाकई इंटरवल के बाद ट्रैक से उतर जाती हैं।” वहीं कुछ ने कहा कि यह डायरेक्टर की स्टाइल है और उनका सिनेमा आम बॉलीवुड फिल्मों से अलग होने की वजह से कभी-कभी भारी लग सकता है।
यानी यह बहस अब सिर्फ दो कलाकारों के बीच की राय न होकर, फिल्मों के कंटेंट बनाम दर्शकों की पसंद का मुद्दा बन चुकी है।
गुलाल और देव डी समीक्षा: पीयूष मिश्रा की बात में कितनी सच्चाई?
गुलाल और देव डी अनुराग कश्यप की उन फिल्मों में गिनी जाती हैं जिन्होंने इंडस्ट्री को नया नजरिया दिया।
गुलाल (2009): यह फिल्म छात्र राजनीति, जातिवाद और समाज के गहरे जख्मों को दिखाती है। फिल्म का पहला हिस्सा बेहद सशक्त है—संवाद, म्यूजिक और कैरेक्टर सब शानदार। लेकिन, इंटरवल के बाद फिल्म लंबी और बिखरी हुई लगती है, जिसकी वजह से उसका असर थोड़ा कम हो जाता है।
देव डी (2009): यह फिल्म देवदास की आधुनिक व्याख्या थी। शुरुआत में इसका ट्रीटमेंट, विजुअल्स और म्यूजिक ने दर्शकों को हिला दिया। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी धीमी और खिंची हुई लगती है, जिससे क्लाइमेक्स तक पहुंचते-पहुंचते दर्शक का उत्साह कम हो जाता है।
पीयूष मिश्रा की आलोचना यहीं फिट बैठती है। यानी उनकी बात सिर्फ एक आरोप नहीं, बल्कि कई दर्शकों और समीक्षकों के अनुभवों से मेल खाती है।
फिर भी, यह भी सच है कि इन फिल्मों ने अपने समय में बॉलीवुड की कहानी कहने की शैली बदल दी। अनुराग कश्यप का सिनेमा आज भी एक्सपेरिमेंटल और क्लासिक की श्रेणी में आता है।
पीयूष मिश्रा और अनुराग कश्यप भारतीय सिनेमा
पीयूष मिश्रा और अनुराग कश्यप दोनों ही भारतीय सिनेमा के अहम चेहरे हैं। एक ने अपने अभिनय और लेखन से पहचान बनाई, तो दूसरे ने डायरेक्शन से नया रास्ता दिखाया। मिश्रा का बयान एक रचनात्मक बहस को जन्म देता है—क्या एक फिल्म को मजबूत बनाने के लिए सिर्फ आइडिया और शुरुआत काफी है, या अंत तक दर्शक को बांधे रखना ही असली चुनौती है?
अनुराग कश्यप की फिल्मों को लेकर यह चर्चा आने वाले समय में भी जारी रहेगी। शायद खुद डायरेक्टर भी इस आलोचना से सबक लेकर अगली फिल्मों में और संतुलन बनाने की कोशिश करें।
आपको क्या लगता है—पीयूष मिश्रा सही कह रहे हैं या अनुराग कश्यप का सिनेमा अलग सोच की वजह से ऐसा है? अपनी राय हमें कमेंट सेक्शन में ज़रूर बताएं और इस आर्टिकल को शेयर करके चर्चा को आगे बढ़ाएँ।